मशरूम उत्पादन आत्मनिर्भरता के लिए बन सकता है एक सफल उद्यम: प्रो. रामनारायण

उन्होंने बताया कि किस प्रकार कम लागत में, स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर, वैज्ञानिक विधियों के माध्यम से मशरूम उत्पादन को एक सफल उद्यम, स्टार्टअप एवं आत्मनिर्भरता का माध्यम बनाया जा सकता है। उन्होंने भारतीय प्रयोगशालाओं एवं शैक्षणिक संस्थानों में उन्नत मशरूम उत्पादन तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता पर भी विशेष बल दिया।

प्रो. रामनारायण ने बताया कि हजारों वर्षों से विश्‍वभर में मशरूम की उपयोगिता भोजन और औषधि दोनों ही रूपों में की जाती रही है। यह पोषण का भरपूर स्रोत है और स्‍वास्‍थ्‍य खाद्यों का एक बड़ा हिस्‍सा बनाता है। मशरूमों में वसा की मात्रा बिल्‍कुल कम होती हैं, विशेषकर प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट की तुलना में, और इस वसायुक्‍त भाग में मुख्‍यतया लिनोलिक अम्‍ल जैसे असंतप्तिकृत वसायुक्‍त अम्‍ल होते हैं, यह हृदय संबंधी प्रक्रिया के लिए आदर्श भोजन हो सकता है। पहले मशरूम का सेवन विश्‍व के विशिष्‍ट प्रदेशों और क्षेत्रों त‍क ही सीमित था लेकिन वैश्‍वीकरण के कारण विभिन्‍न संस्‍कृतियों के बीच संप्रेषण और बढ़ते हुए उपभोक्‍तावाद ने सभी क्षेत्रों में मशरूमों की पहुंच को सुनिश्चित किया है।

कार्यक्रम में विभागाध्यक्ष प्रो. तुहिना वर्मा ने कहा कि आज के समय में माइक्रोबायोलॉजी एवं जैव प्रौद्योगिकी जैसे विषय केवल शोध तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें उद्यमिता और रोजगार की असीम संभावनाएं हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अपने अकादमिक ज्ञान को व्यावहारिक रूप में उपयोग करते हुए नवाचार आधारित उद्यमिता की दिशा में कदम बढ़ाएं।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. आजाद पटेल एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रंजन सिंह ने किया। कार्यक्रम में डॉ. सोनी तिवारी, डॉ. आज़ाद पटेल, शोधार्थी प्रियंका, गरिमा दुबे, सुरभि, नवोदिता, आदर्श कुमार एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

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