गजबः आंखों पर काली पट्टी बांध फर्राटे से पढ़ रहे बच्चे, स्कूलों में अनोखा प्रयोग

क्या कोई आंखों पर गाढ़ी काली पट्टी बांधकर किताबें पढ़ सकता है, रंग पहचान सकता है या चीज़ों को छूकर उनके बारे में सही-सही बता सकता है? पहली नज़र में यह किसी जादू या चमत्कार जैसा लगता है, लेकिन उत्तराखंड के संस्कृत छात्रों के लिए यह अब ध्यान और ‘इनट्यूशन’ यानी छठी इंद्री के अभ्यास का हिस्सा बन चुका है।

आंखों पर काली पट्टी बांध फर्राटे से पढ़ रहे बच्चे

ज्ञान, एकाग्रता और खुशी के इस अनोखे संगम को सच करने के लिए उत्तराखंड संस्कृत शिक्षा विभाग और ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ संस्था ने मिलकर 17 दिनों के खास ट्रेनिंग कैंप की शुरुआत की है। देहरादून के श्री परशुराम चतुर्वेद विद्यालय में आयोजित इस राज्यस्तरीय कार्यक्रम में बच्चों के लिए ‘इनट्यूशन ट्रेनिंग’ और शिक्षकों के लिए तनाव दूर कर खुश रहने वाला ‘आनंद कार्यक्रम’ शुरू किया गया है। देश में यह पहला मौका है जब संस्कृत स्कूलों में इस तरह का अनोखा प्रयोग किया जा रहा है।

चार बड़े गुरुकुलों के बच्चे ले रहे हैं हिस्सा

इस 17 दिनों के कैंप में राज्य के चार बड़े संस्कृत संस्थानों श्री परशुराम चतुर्वेद विद्यालय, श्रीमद् दयानंद आर्ष ज्योतिर्मठ गुरुकुल, श्री शिवनाथ संस्कृत महाविद्यालय और द्रोणस्थली आर्ष कन्या गुरुकुल महाविद्यालय के छात्र-छात्राएं और शिक्षक बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।

कार्यक्रम की शुरुआत में संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार गैरोला मौजूद रहे, वहीं समापन सत्र में कैबिनेट मंत्री ख़ज़ान दास शामिल हुए। मुख्य अतिथि कैबिनेट मंत्री ख़ज़ान दास ने बच्चों के इस हुनर को देखकर उनका हौसला बढ़ाया। उन्होंने कहा, “बच्चों और शिक्षकों के संपूर्ण विकास में इस तरह के आधुनिक और आध्यात्मिक ट्रेनिंग कार्यक्रमों का बहुत बड़ा हाथ है। यह कदम संस्कृत शिक्षा को एक नई ऊँचाई पर ले जाएगा।”

क्या है ‘आंखों पर पट्टी बांधकर पढ़ने’ का तरीका?

इस ट्रेनिंग का मुख्य मकसद बच्चों के अंदर छिपी प्रतिभा, एकाग्रता, आत्मविश्वास और उनकी छठी इंद्री को जगाना है। खास अभ्यासों और ध्यान (मेडिटेशन) के ज़रिए बच्चे आंखों पर पट्टी बंधी होने के बाद भी अपनी अंदरूनी समझ से शब्दों को पढ़ने और समझने में सक्षम हो जाते हैं। दूसरी तरफ, शिक्षकों के लिए रखे गए ‘आनंद कार्यक्रम’ का मकसद उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में पॉजिटिव सोच, दिमागी सुकून और तनावमुक्त माहौल को बढ़ावा देना है, ताकि वे बच्चों को एक बेहतर और ऊर्जावान माहौल दे सकें।

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