रो-धोओ, वोट पाओ, कुर्सी हथियाओ उत्तराखंड में आंसू की सियासत का नया दौर शुरू हो गया है। वसीम बरेलवी का एक शेर है – वैसे तो इक आँसू ही बहा कर मुझे ले जाए, ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता। सियासत में में अब महज तकरीरों, जुमलों, लफ्फाजी से बात नहीं बनती, जनता का वोट पाने के लिए अब ‘ग्लिसरीन’ और ‘गले रुंधने’ की कला में भी महारत हासिल होनी चाहिए। उत्तराखंड की राजनीति में वैसे तो पहाड़, नदी और जंगल के बड़े-बड़े मुद्दे रहे हैं, लेकिन किच्छा नगर पालिका चुनाव ने यह साबित कर दिया कि असली राजनीति तो ‘आंसुओं के समंदर’ में ही तैरती है। चुनाव प्रचार से लेकर मतगणना तक, यहां नेताओं के रोने का ऐसा दौर चला कि लगा मानो नगर पालिका के चुनाव नहीं, बल्कि किसी टीवी सीरियल का हाई-वोल्टेज मेलोड्रामा चल रहा हो।
उत्तराखंड में आंसू की सियासत का नया दौर शुरू
किच्छा के इस ‘रोने-धोने’ वाले राजनीतिक महासंग्राम का पहला अध्याय लिखा गया मंडी समिति स्थित स्ट्रांग रूम के बाहर। चुनाव के बाद जब मतपेटियों की रखवाली का दौर आया, तो पर्दे और तिरपाल लगाने को लेकर पूर्व भाजपा विधायक राजेश शुक्ला और कांग्रेस विधायक तिलकराज बेहड़ के समर्थकों के बीच ऐसी ज़ोरदार भिड़ंत हुई कि माहौल गरमा गया। धक्का-मुक्की और बहसबाज़ी के बीच अचानक नेताजी के आंसू बह निकले। पूर्व विधायक राजेश शुक्ला कैमरे के सामने ही बिलख पड़े। आंखों में आंसू भरकर बोले, “अगर मुझ पर लगे आरोप सही निकले, तो मैं राजनीति ही छोड़ दूंगा!” अब जनता समझ नहीं पा रही थी कि नेताजी विकास कार्यों का हिसाब दे रहे हैं या किसी पुरानी हिंदी फिल्म का संवाद बोल रहे हैं।
दूसरी तरफ, किच्छा के कांग्रेसी विधायक तिलकराज बेहड़ साहब भी किसी से पीछे रहने वाले कहाँ थे! समर्थकों की गहमागहमी और बहस के बीच उन्होंने आरोप लगाया कि किसी ने उनका गाल लाल कर दिया है—यानी थप्पड़ मार दिया है। इस बदसलूकी और तनातनी के बीच विधायक जी इतने भावुक हुए कि रोते-बिलखते हुए वहीं ज़मीन पर गश खाकर गिर पड़े। कुछ देर को तो ऐसा लगा कि राजनीति की बिसात पर कोई गंभीर ऐतिहासिक हादसा हो गया है। जब होश आया, तो फिर से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।
टिकट बंटवारे से शुरु हो चुकी थी रोने की परंपरा
वैसे, किच्छा में रोने की परंपरा सिर्फ चुनाव वाले दिन की नहीं थी। इसकी शुरुआत तो टिकट बंटवारे से ही हो चुकी थी। जब पार्टियों ने उम्मीदवारों की सूचियां जारी कीं, तो टिकट न पाने वाले नेताओं के घरों में सन्नाटा कम और सिसकियों की आवाज़ ज़्यादा सुनाई दी। कांग्रेस के नेता अब्दुल रशीद जक्कू साहब का जब पार्टी ने टिकट काटा, तो वे समर्थकों के सामने ही भावुक होकर रो पड़े। रोते-रोते उन्होंने कसम खाई कि अब तो वे निर्दलीय ही मैदान में उतरेंगे। भाजपा के बागी दावेदार शैली फुटेला और लवी सहगल का भी यही हाल रहा। पार्टी की ‘बेवफाई’ से आहत होकर दोनों ने अपने-अपने समर्थकों के कंधे पर सिर रखकर आंसू बहाए और बग़ावत का परचम लहरा दिया।
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किच्छा के आम मतदाता अब एक-दूसरे से मुस्कुराते हुए पूछ रहे हैं कि भाई, विकास का बजट तो बाद में आएगा, लेकिन पहले यह बताओ कि इन रोते हुए नेताओं को चुप कराने का बजट कौन देगा? जनता समझ चुकी है कि चुनाव में चाहे टिकट कटे या गाल पर थप्पड़ पड़े, असली मज़ा तो आंसुओं की राजनीति में ही है। जब सारे दांव-पेच फेल हो जाएं, तो ‘अश्रु अस्त्र’ ही नेताओं का सबसे बड़ा हथियार बन जाता है! अब चुनाव का जो भी नतीजा हो जो जीत जाएगा, वह शायद दूसरे से आनंद नारायण मुल्ला का यह शेर कहेगा ‘रोने वाले तुझे रोने का सलीक़ा ही नहीं, अश्क पीने के लिए हैं कि बहाने के लिए
आंसू बहाने की खासी लंबी तारीख
उत्तराखंड की राजनीति में चुनाव प्रचार, टिकट बंटवारे और कुर्सी जाने के बाद नेताओं का भावुक होना और वोट पाने के लिए आंसू बहाने की खासी लंबी तारीख रही है। ऐन वक्त टिकट कटकर किसी अन्य नेता को मिल जाने, चुनाव प्रचार के अंतिम क्षणों में जनता का सहानुभूति हासिल करने और राजनीतिक अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद और पुरानी वफादारी साबित करने की कोशिश में नेताओं के आंसू बहते रहते हैं। राज्य में कई मौकों पर अलग-अलग सियासी जमात के दिग्गजों और उम्मीदवारों को जनता के सामने रोते या भावुक होते देखा गया है। 2022 में डॉ. हरक सिंह रावत बीजेपी से निष्कासित किए जाने और कांग्रेस में वापसी के दौरान वह टीवी चैनलों पर साक्षात्कार देते समय कई बार भावुक होकर रो पड़े। उन्होंने अपने पुराने राजनीतिक संघर्षों और निष्कासन के दर्द का जिक्र करते हुए आंसू बहाए थे। 2022 के विधानसभा चुनाव प्रचार के आखिरी दिन लक्सर विधानसभा सीट से तत्कालीन भाजपा प्रत्याशी संजय गुप्ता का एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ था। जनसभा और डोर-टू-डोर कैंपेन के दौरान वह जनता के सामने हाथ जोड़कर रो पड़े थे। उन्होंने भावुक होकर कहा था, “चाहे मेरे कपड़े फाड़ दो, जूते की माला पहना दो, लेकिन मुझे वोट ज़रूर देना।”
2022 के विधानसभा चुनाव में जब भारतीय जनता पार्टी ने लालकुआं सीट से तत्कालीन विधायक नवीन दुमका का टिकट काटकर डॉ. मोहन सिंह बिष्ट को अपना उम्मीदवार बनाया तो टिकट की दौड़ में शामिल पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व दर्जा राज्य मंत्री ओम प्रकाश प्रीतम टिकट न मिलने पर अपने समर्थकों के सामने काफी भावुक हो गए थे और उनके आंसू छलक आए थे। 2022 चुनाव से ठीक पहले यशपाल आर्य और उनके बेटे संजीव आर्य ने बीजेपी छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा, तो वहां स्थानीय दावेदारों में असंतोष दिखा। वहीं, टिकट न मिलने पर कई स्थानीय नेता और पूर्व दर्जा प्राप्त मंत्री मीडिया के सामने रोते दिखे थे। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत भी कई राजनीतिक मंचों पर भावुक हुए हैं। हालांकि वे प्रत्यक्ष रूप से चुनाव प्रचार में उस तरह रोते नहीं दिखे, लेकिन 2017 में अपनी दोनों सीटें (किच्छा और हरिद्वार ग्रामीण) हारने के बाद तथा 2022 में लालकुआं से हारने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते समय कई बार उनके गले रुंध गए थे और आंखें नम हो गई थीं।
