अस्तित्व के संकट से जूझता सारण जिले के बरवाघाट का गोर धोवान मेला

घोघारी नदी के तट पर लगने वाला यह मेला जो 200 वर्षों से भी अधिक पुराना है हर साल कार्तिक पूर्णिमा के अगले दिन लगता है।

इस साल विधानसभा चुनाव के कारण यह गुरुवार की जगह शुक्रवार को आयोजित हुआ।इस मेले की सबसे बड़ी पहचान है ‘गोर धोवान’ की परंपरा मान्यता है कि वनवास के दौरान भगवान राम ने यहीं प्रवास किया था और जनकपुर जाने से पहले लक्ष्मण के साथ घोघारी नदी के तट पर अपने हाथ-पैर धोए थे और बरगद के पेड़ के नीचे विश्राम किया था।

ग्रामीण के अनुसार गंगा नहान और बरवाघाट के गोरधोवान के पुण्य एक बराबर होता है. यही वजह है कि आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां नदी के संकीर्ण हो चुके स्वरूप में पैर धोकर अपने पापों के धुल जाने की कामना करते हैं. यह मेला लकड़ी के फर्नीचर, खिलौनों, मीना बाजार और मिठाइयों सहित सभी तरह के सामानों के लिए भी प्रसिद्ध है। हालांकि इस बार मेले में स्थानीय प्रशासन की उदासीनता स्पष्ट दिखी। पहली बार मेले में किसी तरह का कोई सरकारी कैंप नहीं लगा है।

ग्रामीण संतोष कुमार ने बताया कि मेला तो लगा है पर प्रशासन का सहयोग पहले जैसा नहीं दिखा जो कि दुखद है. इस पौराणिक एवं ऐतिहासिक मेला जो 200 साल से अधिक पुराना है अब अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है. नदी की धारा लगभग चुकी है और ऐतिहासिक धरोहर उपेक्षा का शिकार है. बड़वाघाट मेला समाप्ति के कगार पर नजर आता हुआ दिखाई दे रहा है. सरकार को इसे दर्शनीय स्थल घोषित करना चाहिए.