क्या आगामी विधानसभा चुनाव में रुद्रप्रयाग विधानसभा सीट में कैबिनेट मंत्री भरत सिंह चौधरी की चौधराहट धरी की धरी रह जाएगी? लगातार दो बार विधायक रहने से उपजने वाली एंटी-इनकम्बेंसी और जनता की लगातार बढ़ती उम्मीदें और कभी कभी उनके बयानों से झलकने वाली ऐरोगैंस क्या उनकी जमीन खिसका देगी? देश प्रदेश के जो सियासी हालात हैं जेन जी आंदोलन और दलित सम्मान का मुद्दों का वहां क्या असर पडेगा ? रुद्रप्रयाग को यही सवाल मथ रहे हैं।
गढ़वाल संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली रुद्रप्रयाग विधानसभा सीट उत्तराखंड की राजनीति में हमेशा से खासा प्रभाव रखती है। केदारनाथ धाम के मुख्य द्वार के रूप में प्रसिद्ध यह विधानसभा क्षेत्र राज्य गठन के बाद से ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress) के बीच सीधे मुकाबले का गवाह रहा है। हालांकि, बीते एक दशक में इस सीट की सियासत जिस एक नाम के इर्द-गिर्द सिमट आई है वह है-भरत सिंह चौधरी। 2017 में पहली बार भाजपा के सिंबल पर जीत दर्ज करने वाले भरत सिंह चौधरी ने 2022 में न केवल अपनी सीट बचाई, बल्कि वर्तमान में पुष्कर सिंह धामी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनकर अपनी राजनीतिक हैसियत को और मजबूत किया है।
भरत सिंह चौधरी के सिर जीत की हैट्रिक लगाने का दबाव
आगामी चुनावी बिसात बिछने के बीच रुद्रप्रयाग का सियासी पारा गर्म होने लगा है। एक तरफ जहां भरत सिंह चौधरी के सिर जीत की हैट्रिक लगाने का दबाव है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी घेराबंदी और जातीय समीकरणों को साधने की गंभीर चुनौती भी उनके सामने खड़ी है।
रुद्रप्रयाग विधानसभा क्षेत्र का चुनावी रण का इतिहास देखें तो शुरुआती दौर में यहां कांग्रेस और भाजपा के दिग्गजों के बीच वर्चस्व की जंग रही। 2002 के पहले विधानसभा चुनाव और 2007 में भाजपा के मातबर सिंह कण्डारी ने कांग्रेस को पटखनी दी थी। 2012 में राजनीति के चतुर खिलाड़ी माने जाने वाले डॉ. हरक सिंह रावत ने कांग्रेस के टिकट पर मातबर सिंह कण्डारी को बेहद कड़े मुकाबले में पराजित किया।
2017 में इस सीट पर भरत चौधरी का अभ्युदय हुआ। वह 2012 में निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़े और 7,988 वोट हासिल किए। मगर 2017 में उन्होंने भाजपा का दामन थाम भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और कांग्रेस की लक्ष्मी राणा को 14600 से ज्यादा वोटो से शिकस्त देकर रुद्रप्रयाग में भाजपा की वापसी कराई।
SIR में रुद्रप्रयाग सीट से कटे 6,405 वोट
2022 में भरत सिंह चौधरी ने कांग्रेस के प्रदीप थपलियाल को 9,802 वोटों के अंतर से हराया और लगातार दूसरी बार विधायक चुने गए। रुद्रप्रयाग सीट में SIR में फिलहाल 6,405 वोट कट गए हैं ऐसे में इन कटे वोटों का असर पड़ना लाजिमी है। इस सीट में उक्रांद व कुछ निर्दलीय उम्मीदवार भी प्रभावशाली रहे हैं और चाहे खुद जीतने की स्थिति में न रहते हों मगर हार जीत के खेल में खटास पैदा करने की क्षमता तो रखते ही है।
ठाकुर-ब्राह्मण संतुलन की कसौटी
रुद्रप्रयाग विधानसभा सीट का सामाजिक ताना-बाना मुख्य रूप से सवर्ण बहुल है। यहां राजपूत और ब्राह्मण मतदाताओं का वर्चस्व ही किसी भी प्रत्याशी की जीत या हार की पटकथा लिखता है। यहां 40 से 45 फीसद राजपूत या ठाकुर मतदाता सबसे बड़ा और निर्णायक वोट बैंक हैं। रुद्रप्रयाग के अधिकांश विधायक और प्रमुख क्षत्रप इसी वर्ग से आते हैं।
हवा का रुख मोड़ने की क्षमता रखता है ब्राह्मण मतदाता
स्वयं ठाकुर समुदाय से आने वाले कैबिनेट मंत्री भरत सिंह चौधरी के पास इस वर्ग में मजबूत पैठ है, लेकिन इस वोट बैंक को एकजुट रखना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। दूसरा सबसे प्रभावशाली वोटर वर्ग है, ब्राह्मण। जो करीब 30 से 35 फीसद है। यह ब्राह्मण मतदाता हवा का रुख मोड़ने की क्षमता रखते हैं। भरत सिंह चौधरी के लिए इस वर्ग का समर्थन बनाए रखना चुनावी वैतरणी पार करने के लिए बेहद आवश्यक माना जाता है।
रुद्रप्रयाग विधानसभा क्षेत्र में 15 से 16 फीसद अनुसूचित जाति मतदाता है। जो हार-जीत के अंतर को तय करने में ‘साइलेंट फैक्टर’ की भूमिका निभाते हैं। यहां रुद्रप्रयाग, तिलवाड़ा और अगस्त्यमुनि जैसे कस्बाई इलाकों में पांच से आठ फीसद ओबीसी अन्य व्यापारी वर्ग है जिसका असर आर्थिक व व्यापारिक नीतियों पर रहता है।
स्थानीय मुद्दों से प्रभावित होता है जनता का सियासी मिजाज
रुद्रप्रयाग क्षेत्र की जनता का सियासी मिजाज कई स्थानीय मुद्दों से गहराई से प्रभावित होता है। केदारनाथ यात्रा का मुख्य पड़ाव होने के कारण रुद्रप्रयाग में यात्रा प्रबंधन, स्थानीय व्यापारियों के हित और युवाओं के लिए स्वरोजगार सबसे बड़े मुद्दे हैं। भरत सिंह चौधरी के मंत्री बनने के बाद जनता उनसे यात्रा मार्ग के सुदृढ़ीकरण और एमएसएमई व खादी-ग्रामोद्योग के माध्यम से नए रोजगार सृजन की उम्मीद लगाए बैठी है। पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क कनेक्टिविटी के साथ-साथ जिला अस्पताल रुद्रप्रयाग की स्थिति और दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती एक बड़ा चुनावी विषय बना हुआ है।
दावेदारों की स्थिति: भरत चौधरी के सामने कहां है कौन?
रुद्रप्रयाग में टिकटों की होड़ और दावेदारी का खेल दोनों प्रमुख दलों में दिलचस्प मोड़ पर है। भाजपा में हालांकि भरत चौधरी वर्तमान में कैबिनेट मंत्री होने के साथ-साथ दो बार के सफल विधायक होने के नाते भाजपा के सबसे स्वाभाविक और प्रबल दावेदार हैं। संगठन पर पकड़, विकास कार्यों का रिपोर्ट कार्ड और सरकार में उनका बढ़ता कद उन्हें बाकी दावेदारों से काफी आगे रखता है। लेकिन भाजपा का पुराना कैडर और भाजपा के कुछ स्थानीय युवा, संघ पृष्ठभूमि के नेता अंदरखाने अपनी जमीन तलाश रहे हैं और चौधरी को चुनौती दे सकते हैं।
कांग्रेस में 2022 के चुनाव में उपविजेता रहे प्रदीप थपलियाल लगातार क्षेत्र में जनमुद्दों को लेकर सक्रिय हैं। ब्राह्मण मतदाताओं के बीच पकड़ और जमीनी जुड़ाव के दम पर वे कांग्रेस से मुख्य दावेदार माने जा रहे हैं। पूर्व विधायक हरक सिंह रावत के समर्थक भी क्षेत्र में सक्रिय हैं और वह भी अपने किसी निष्ठावान कार्यकर्ता को टिकट दिलाने की जोड़-तोड़ में लगे रहते हैं। यूथ कांग्रेस के स्थानीय चेहरे भी कांग्रेस से टिकट की आस में हैं।
रुद्रप्रयाग की जनता का मिजाज भांपना आसान नहीं
रुद्रप्रयाग की जनता का मिजाज भांपना आसान नहीं रहा है, लेकिन कुछ समय पहले भरत सिंह चौधरी के जनता को लताड़ लगाते कुछ वीडियो खूब वायरल हुए थे। उनका अब क्या असर है यह वक्त बताएगा। भरत सिंह चौधरी को जहां सरकार के संसाधनों और अपने 10 साल के कार्यों का सहारा है, वहीं लेकिन अगर भरत चौधरी अपनी विकास योजनाओं को धरातल पर उतारने और जातिगत समीकरणों को अपने पक्ष में बनाए रखने में सफल रहते हैं, तो रुद्रप्रयाग में भाजपा के गढ़ को भेदना विपक्ष के लिए एक कठिन चुनौती साबित होगा।
